साज़िश की बातें हमसे क्यों करते हो,
क्या हम तुम्हें बिकाऊ लगते हैं?
तुम तो हर सख्स की कीमत लगाते हो,
हमारे यहाँ उसूल, सिक्कों से बड़े होते हैं।
तुम्हारे यहाँ सौदे होते होंगे ज़मीरों के,
हम वहाँ अपने किरदार तौलते नहीं,
तुम छुट्टा गिनते रहो, उम्र भर बैठकर,
हम अपने वजूद की सँजो कर रखते हैं।
नोटों की खनक से हमें मत परखना,
हम वो लोग हैं जो भूखे रहकर भी अकड़ते हैं,
तुम बाज़ार में आदमी की बोली लगाते रहो,
हम सच के लिए अकेले खड़े रहते हैं।
तुम्हारी साज़िशें तुम्हें मुबारक रहें,
हम अपनी राह पर बेखौफ़ चलते हैं,
तुम हिसाब रखते हो किसने क्या दिया,
हम हिसाब रखते हैं किसके लिए लड़े हैं।
हमें खरीदने का ख़्वाब छोड़ दो,
हम किसी कीमत पर बिकने वालों में नहीं,
तुम छुट्टा गिनते रहो अपनी मुट्ठी में…
हम किरदार गिनते हैं, सिक्के नहीं।
-रतन कुमार कैथवास