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वो केवल दस्ताने निकले

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैंने किताब बंद की,
        
                                                    
                            
और सामने बैठे बूढ़े दर्ज़ी से पूछा…
"क्या ऐसा भी हो सकता है?"
उसने बिना सिर उठाए कहा…
"क्या?"
मैंने वही दो पंक्तियाँ :
जिनको पकड़ा हाथ समझकर,
वो केवल दस्ताने निकले।
दोहरा दीं।
वो मुस्कुराया।
बोला…
"तुम्हें गप्प लगती है?"
मैंने कहा…
"हाँ।
हाथ और दस्ताने में
इतना बड़ा फ़र्क कैसे हो सकता है?"
दर्ज़ी ने सुई में धागा पिरोया,
फिर बोला…
"आओ, एक किस्सा सुनाता हूँ।
एक लड़का रोज़ मेरी दुकान पर आता था।
हर बार कहता…
'चाचा, मेरे बहुत अपने हैं।
मुसीबत में सब साथ खड़े रहेंगे।'
मैं हर बार मुस्कुरा देता।
एक दिन उसके पिता बीमार पड़े।
इलाज लंबा था,
जेब छोटी थी।
उसने एक-एक करके
सबके दरवाज़े खटखटाए।
किसी ने कहा…
'यार, अभी थोड़ा बिज़ी हूँ।'
किसी ने कहा…
'देखते हैं...'
किसी ने फ़ोन ही उठाना बंद कर दिया।
उस शाम वो मेरी दुकान पर आया।
उसकी आँखें भीगी थीं।
मैंने पूछा…
'क्या हुआ?'
वो बोला…
'आज समझ आया...
कुछ लोग हाथ नहीं थे,
केवल दस्ताने थे।
मौसम अच्छा था,
तो साथ रहे।
ज़रा-सी सर्दी आई,
तो उतरकर अलग रख दिए गए।'"
मैं चुप हो गया।
दर्ज़ी ने मेज़ पर रखे,
एक पुराने दस्ताने को उठाया।
बोला…
"दस्ताने की एक आदत होती है।
वो हाथ का आकार तो ले लेते हैं,
लेकिन हाथ की गर्मी,
अपने अंदर पैदा नहीं कर सकते।
गर्मी हमेशा हाथ की होती है,
दस्ताने की नहीं।"
मैंने पूछा…
"तो असली हाथ कैसे पहचानें?"
वो हँसा।
बोला…
"जब तुम्हारी ज़िंदगी में
मौसम बदलने लगें,
तब देखना।
जो धूप में साथ चले,
वो साथी हो सकते हैं।
जो बारिश में भी रुक जाएँ,
वो अपने होते हैं।
और जो आँधी में
तुम्हारा हाथ छोड़ने के बजाय,
और कसकर पकड़ लें...
उन्हें कभी खोना मत।"
मैंने धीरे से कहा…
"तो हर मुस्कुराता चेहरा
अपना नहीं होता?"
वो बोला…
"नहीं बेटा।
कुछ लोग तस्वीर में अच्छे लगते हैं,
कुछ तक़दीर में।
फ़र्क़ बस इतना है।"
उस दिन लौटते हुए,
मैंने महसूस किया,
ज़ख्म नए नहीं थे,
बस पहचान नई हुई थी।
और शायद ज़िंदगी का, सबसे कठिन सबक यही है…
हर हाथ, हाथ नहीं होता।
कुछ हाथ दुआ बनते हैं,
कुछ सहारा बनते हैं,
और कुछ...
सिर्फ़ दस्ताने निकलते हैं,
जो मौसम बदलते ही,
अलमारी में, टाँग दिए जाते हैं।
आहों का अंदाज़ नया था,
लेकिन ज़ख्म पुराने निकले।
जिनको पकड़ा हाथ समझकर,
वो केवल दस्ताने निकले।
कहावत सही लग रही है…
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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