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वादा निभाने आया था

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर दिन धूप तड़पती थी,
        
                                                    
                            
अँधियारों से उसको डर लगता था।
शायद भरोसा कम करती थी,
सुबह तड़प के फिर मिलती थी।

मैंने एक दिन सूरज से पूछा,
"तुम सुबह रोज़ क्यों लौट आते हो?
जब हर शाम तुम्हें
अँधेरों के हवाले होना ही है।"

सूरज मुस्कुराया नहीं,
बस अपनी किरणें समेटने लगा।
शायद कुछ जवाब,
रोशनी नहीं, अनुभव देते हैं।

रात धीरे-धीरे उतर आई।
पेड़ों की परछाइयाँ लंबी हो गईं,
पंछी अपने घोंसलों में लौट गए,
और शहर सोने की कोशिश में लग गया।

मगर मैंने देखा…
दूर क्षितिज पर,
एक पतली-सी सुनहरी लकीर,
अब भी अँधेरे से लड़ रही थी।

तभी हवा ने कानों में कहा…
"धूप को अँधेरों से डर नहीं लगता,
उसे बस इस बात की जल्दी रहती है,
कि कहीं किसी खिड़की में,
उसका इंतज़ार अधूरा न रह जाए।"




अगली सुबह,
मैं उसी जगह फिर गया।
ओस की बूँदें दूब घास पर मोतियों सी थीं,
फूल फिर से मुस्कुरा रहे थे,
और सूरज पहले से कहीं ज़्यादा चमकीला था।

तब समझ आया…
वो रात से हारकर नहीं लौटा था,
वो अपना वादा निभाने आया था।
ज़िंदगी भी धूप जैसी होती है।
हर दिन थकती है,
हर शाम बिखरती है,
फिर भी अगली सुबह
नई उम्मीद लेकर लौट आती है।

इसलिए शायद,
सुबह तड़पकर फिर से मिलती है।
क्योंकि उसे मालूम है…
अँधेरा कभी मंज़िल नहीं होता,
वो तो बस रोशनी की क़ीमत समझाने के लिए,
कुछ पल का मेहमान होता है।
और जो हर रात के बाद,
मुस्कुराकर लौट आए,
उसी का नाम उम्मीद है,
उसी का नाम जीवन है।
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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