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तसव्वुर में ही मिला करो

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हक़ीक़त की दुनिया में नहीं, तो तसव्वुर में ही मिला करो,
        
                                                    
                            
राह खोए मुसाफ़िर के लिए, चाँदनी बनकर खिला करो।
हर दफ़ा मुकम्मल होना ज़रूरी तो नहीं होता,
कुछ रिश्ते दूर रहकर भी उम्र भर साथ चलते हैं।
तुम बस हवा की तरह छू जाया करो,
मैं ख़ुशबू की तरह तुम्हें महसूस कर लूँगा।
एक रात एक मुसाफ़िर रेगिस्तान में भटक गया,
न रास्ता दिखता था, न कोई कारवाँ।
तभी दूर कहीं चाँद निकला,
और रेत पर दूधिया उजाला बिखर गया।
चाँद ने मुस्कुराकर कहा,
"मैं तुझे मंज़िल तक नहीं पहुँचा सकता,
मगर अगला क़दम कहाँ रखना है,
इतनी रोशनी ज़रूर दे सकता हूँ।"
मुसाफ़िर चलता रहा।
हर क़दम पर उसे लगा,
जैसे कोई ख़ामोशी से उसके साथ चल रहा हो।
न कोई हाथ था,
न कोई आवाज़,
फिर भी तन्हाई आधी हो गई थी।
सुबह हुई तो मंज़िल सामने थी।
लोगों ने उसकी हिम्मत की तारीफ़ की,
पर वह जानता था,
रात अगर चाँदनी न मिली होती,
तो शायद यह सफ़र यहीं रुक जाता।
ज़िंदगी में भी कुछ लोग ऐसे ही होते हैं।
वे हर वक़्त साथ नहीं रहते,
न हर दुख का इलाज बन पाते हैं,
लेकिन जब अँधेरा सबसे गहरा होता है,
तब उनकी एक याद, एक दुआ, एक मुस्कान
रास्ता दिखा जाती है।
इसलिए मैं तुझसे मिलने की ज़िद नहीं करता,
बस इतना चाहता हूँ…
जब भी मेरी रातें थक जाएँ,
तू एक उजली याद बनकर उतर आना।
जब भी मेरी उम्मीदें डगमगाएँ,
तू एक ख़ामोश दुआ बनकर ठहर जाना।
हक़ीक़त की दुनिया में नहीं, तो तसव्वुर में ही मिला करो,
राह खोए मुसाफ़िर के लिए, चाँदनी बनकर खिला करो।

मंज़िलें अक्सर पैरों से नहीं,
उम्मीद की रोशनी से तय होती हैं,
और कुछ लोग ज़िंदगी में,
सिर्फ़ मिलने के लिए नहीं,
रास्ता दिखाने के लिए आते हैं।
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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