सपने में मत बाँध हवा को, आने दो बेखौफ हवा को,
खिड़की खोलो, राह दिखाओ, छू लेने दो हर गाँव-गाँव को।
कब तक मुट्ठी में रखोगे तुम, इस खुले गगन की छाँव को,
जिसने पंख दिए हैं पंछी को, क्यों बाँधो उसकी उड़ान को?
बंद कमरों में घुटता जीवन, बाहर हँसता है संसार,
थोड़ी धूप भी आने दो, थोड़ा जीने दो इस साहस को।
हवा अगर है तो चलने दो, बादल हैं तो बरसने दो,
मन में जमी हुई धूल को भी, एक झोंके में बहने दो।
नदियाँ रोक सकोगे कब तक, लहरों को समझाओगे क्या?
जिसे प्रकृति ने मुक्त किया है, उसको तुम रोक पाओगे क्या?
सपने में मत बाँध हवा को, आने दो बेखौफ हवा को,
जीवन है तो बहने दो इसे… मत कैद करो इस दुआ को।
-रतन कुमार कैथवास