सपनों की चिंगारी लेकर, सूरज को आँख दिखा न सका,
अपने ही डर की दीवारों से, आगे पाँव बढ़ा न सका।
दूर क्षितिज पर धूप खड़ी थी, देती रोज़ इशारा था,
मैं ही अपने संशय के कारण, उसका हाथ थाम न सका।
धुएँ हुए सब गीत तुम्हारे, जलते रहे अरमानों में,
राख हुई हर धुन की खुशबू, फिर भी तुम्हें भुला न सका।
इस हलचल-सी दुनिया में भी, कितने मेले लगते थे,
अपने मन के सूनेपन को, लेकिन मैं बहला न सका।
मैं तेरे सफ़र का मुसाफ़िर हूँ, क्या तुमको मालूम है?
तेरी राहों से जुड़कर भी, तेरा घर अपना बना न सका।
रात सितारों से भरती थी, चाँद कहानी कहता था,
तेरी यादों की चौखट से, इक पल भी दूर जा न सका।
वक़्त ने लाख समझाया मुझको, छोड़ पुराने किस्सों को,
दिल ने तेरे नाम की मिट्टी, हाथों से बिखरा न सका।
बरसों बाद उसी मोड़ पर जब, किस्मत फिर से आ बैठी,
आँखों में जो बात थी मेरी, होंठों तक ला न सका।
दर्द अगर दरिया बन जाए, बहना उसका धर्म बने,
मैं पत्थर-सा बीच किनारे, ख़ुद को फिर भी पिघला न सका।
लोगों ने तो जीत लिखी थी, अपने-अपने हिस्सों में,
मैं रिश्तों की हार बचाने, कोई दाँव चला न सका।
अब भी जब तेरा ज़िक्र चले, दिल चुपके से हँस देता है,
इश्क़ किया था पूरे मन से, बस इतना भर कह न सका।
सपनों की चिंगारी लेकर, अब फिर राह बनाऊँगा,
जो कल सूरज तक जा न सका, कल उससे आँख मिलाऊँगा।
मैं तेरे सफ़र का मुसाफ़िर हूँ, ये सच अब भी ज़िंदा है,
मंज़िल चाहे साथ न आए, तुझसे अपना रिश्ता ज़िंदा है।
-रतन कुमार कैथवास