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सपनों की चिंगारी लेकर

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सपनों की चिंगारी लेकर, सूरज को आँख दिखा न सका,
        
                                                    
                            
अपने ही डर की दीवारों से, आगे पाँव बढ़ा न सका।

दूर क्षितिज पर धूप खड़ी थी, देती रोज़ इशारा था,
मैं ही अपने संशय के कारण, उसका हाथ थाम न सका।

धुएँ हुए सब गीत तुम्हारे, जलते रहे अरमानों में,
राख हुई हर धुन की खुशबू, फिर भी तुम्हें भुला न सका।

इस हलचल-सी दुनिया में भी, कितने मेले लगते थे,
अपने मन के सूनेपन को, लेकिन मैं बहला न सका।

मैं तेरे सफ़र का मुसाफ़िर हूँ, क्या तुमको मालूम है?
तेरी राहों से जुड़कर भी, तेरा घर अपना बना न सका।

रात सितारों से भरती थी, चाँद कहानी कहता था,
तेरी यादों की चौखट से, इक पल भी दूर जा न सका।

वक़्त ने लाख समझाया मुझको, छोड़ पुराने किस्सों को,
दिल ने तेरे नाम की मिट्टी, हाथों से बिखरा न सका।

बरसों बाद उसी मोड़ पर जब, किस्मत फिर से आ बैठी,
आँखों में जो बात थी मेरी, होंठों तक ला न सका।

दर्द अगर दरिया बन जाए, बहना उसका धर्म बने,
मैं पत्थर-सा बीच किनारे, ख़ुद को फिर भी पिघला न सका।

लोगों ने तो जीत लिखी थी, अपने-अपने हिस्सों में,
मैं रिश्तों की हार बचाने, कोई दाँव चला न सका।

अब भी जब तेरा ज़िक्र चले, दिल चुपके से हँस देता है,
इश्क़ किया था पूरे मन से, बस इतना भर कह न सका।

सपनों की चिंगारी लेकर, अब फिर राह बनाऊँगा,
जो कल सूरज तक जा न सका, कल उससे आँख मिलाऊँगा।

मैं तेरे सफ़र का मुसाफ़िर हूँ, ये सच अब भी ज़िंदा है,
मंज़िल चाहे साथ न आए, तुझसे अपना रिश्ता ज़िंदा है।
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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