उससे हँसी-मज़ाक में मैंने कहा…
"सपने दिन में ही देख लिया करो,
रात को क्यों अपनी नींद ख़राब करती हो?"
मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी,
कि उसने भौंहें चढ़ाकर मेरी ओर देखा।
बोली…
"अच्छा जी...
अब सपनों पर भी टाइम-टेबल लागू करोगे?"
मैं मुस्कुरा दिया।
वह बिना रुके आगे बोली…
"सपने कभी भी आ सकते हैं,
इनका कोई समय नहीं होता,
न कोई छुट्टी,
न कोई घंटी बजती है कि,
अब सपने देखने का समय शुरू हुआ।"
मैंने बात को और छेड़ते हुए कहा…
"लेकिन रात को तो आराम करना चाहिए,
सुबह उठकर काम भी करना होता है।"
वह हल्का-सा हँसी,
फिर खिड़की से बाहर देखते हुए बोली…
"रात के सपने नींद नहीं चुराते,
वे तो उम्मीदों की रखवाली करते हैं।
नींद तब टूटती है,
जब सपनों पर यक़ीन टूट जाता है।"
उसकी बात में,
शरारत कम और अनुभव ज़्यादा लग रहा था।
मैंने पहली बार गौर से देखा,
उसकी आँखों के नीचे,
हल्की-सी थकान थी,
लेकिन आँखों के भीतर,
अब भी कुछ अधूरे सपने जगमगा रहे थे।
मैंने पूछा…
"तो फिर बताओ,
तुम्हें सबसे ज़्यादा, कौन-सा सपना जगाए रखता है?"
वह कुछ देर चुप रही।
फिर धीरे से बोली…
"हर इंसान की ज़िंदगी में,
एक ऐसा सपना होता है,
जो सोने नहीं देता,
क्योंकि उसे पूरा करने की ज़िद,
नींद से भी बड़ी हो जाती है।"
उसकी आवाज़ में,
न शिकायत थी,
न कोई नाटक।
बस एक सच्चाई थी।
मैंने हँसते हुए कहा…
"चलो, मान लिया कि सपनों का,
कोई टाइम-टेबल नहीं होता।
लेकिन जब वे पूरे हो जाएँ,
तो एक छुट्टी ज़रूर ले लेना..."
वह खिलखिलाकर हँस पड़ी और बोली…
"सपने पूरे होते ही कहाँ हैं...
एक पूरा होता है,
तो दूसरा, दरवाज़ा खटखटाने लगता है।
ज़िंदगी शायद इसी का नाम है।"
उस शाम मुझे समझ आया…
घड़ी की सुइयाँ,
समय का हिसाब रखती हैं,
लेकिन सपने...
वे न दिन देखते हैं,
न रात।
वे तो बस उसी दिल में उतरते हैं
जहाँ अभी भी उम्मीद,
ज़िंदा रहती है।
-रतन कुमार कैथवास