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सच की किताब में

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सच की किताब में, बारूद का धुआँ क्यों घुसा रहे हो,
        
                                                    
                            
क्या सीढ़ियों पर चढ़कर, अचार के आम तोड़ने हैं?

हक़ीक़त की स्याही में, ये ज़हर क्यों मिला रहे हो,
किसके इशारे पर, आईनों को धुँधला बना रहे हो।

सच को अगर सच रहने दो, तो उजाला कम न होगा,
झूठ के धुएँ से, सूरज कहाँ कभी छुपा रहे हो।

किताबों की तहज़ीब, को बारूद से मत तौलो,
इल्म के दरवाज़े पर, नफ़रत क्यों सजा रहे हो।

सीढ़ियाँ तो शिखरों तक, पहुँचने के लिए बनती हैं,
तुम उन्हे अचार के आम, तोड़ने का हुनर बता रहे हो।

औज़ारों का भी, अपना एक मक़सद हुआ करता है,
तुम हर हुनर को, खिलवाड़ क्यों बना रहे हो?

जिस क़लम से, नस्लों की तक़दीर बदल जानी थी,
उसी से फ़सादों का नक़्शा, क्यों बना रहे हो?

मिट्टी की ख़ुशबू को, बारूद में मत बदला करो,
तुम खेतों से फसल नहीं, सिर्फ़ राख उगा रहे हो।

याद रखो…

सच को धुएँ की नहीं,
साफ़ हवा की, ज़रूरत होती है।

और जो लोग, हर सवाल का जवाब,
बारूद की गंध में ढूँढ़ते हैं,

वो अक्सर इतिहास नहीं लिखते,
सिर्फ़ उसके पन्नों को जला रहे होते हैं।
ये ठीक लोग नहीं होते हैं,
आगे भी, इनसे बच के रहना होगा…
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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