सच कैसे मैं कह पाता, दिल का मौसम क्या था,
भीड़ बहुत थी साथ मगर, अब अपना कौन बचा था।
दूर गगन के पंछी सारे, छू आए थे अंबर,
मेरे हिस्से एक पिंजरा था, टूट गया था पर।
उड़ने की हर चाहत मेरी, राहों में सो जाती,
हिम्मत की हर इक चिंगारी, आँधी में खो जाती।
सावन की बरसातों में भी, रंग हज़ारों थे,
भीगे आँगन, भीगी गलियाँ, हँसते नज़ारे थे।
ढोल बजे तो गाँव का बच्चा-बच्चा झूम उठा था,
हम यादों की गठरी लेकर, चौखट पर ही रुक गए।
सोच के भंगड़ा कर लेते, मन ने साथ न छोड़ा,
दर्द ने ऐसी बाँह थी पकड़ी, पाँव न आगे मोड़ा।
लोग समझते रूठे होंगे, बात यही बस होगी,
कौन बताए सीने अंदर, कैसी आग दबी थी।
आँख मिली तो हँस भी दिए, दिल मगर रोता था,
हर मुस्कान के पीछे कोई, चुप-सा किस्सा होता था।
वक़्त ने फिर समझाया हमको, हार नहीं थी किस्मत,
अपने ही संदेहों ने हमसे, छीनी थी वह हिम्मत।
अब जो पीछे मुड़कर देखा, धुंध सभी छँट जाती,
सच की धूप उतरते ही फिर, हर उलझन मिट जाती।
आज अगर तुम पूछो मुझसे, कैसी रही कहानी,
आधी मेरी ख़ामोशी थी, आधी तेरी निशानी।
सच कैसे मैं कह पाता, दिल का राज़ पुराना,
ज़ख़्म हरे थे, शब्द अधूरे, मुश्किल था समझाना।
अब तो इतना जान लिया है, जीवन का ये नाता…
उड़ना पहले मन सीखे तो, उड़ाता है विधाता।
सच कैसे मैं कह पाता...
अब कहता हूँ मुस्काकर…
हार नहीं थी पंखों की,
डर ने रोका था अंदर।
-रतन कुमार कैथवास