अगर ख़फ़ा है तो खुलकर ख़फ़ा रहा कर तू,
मेरे क़रीब रहकर यूँ दिल न दुखाया कर।
अदावतों में भी कुछ तो लिहाज़ रहता है,
जो दिल पे बीत रही है उसे न आज़माया कर।
तू दोस्त था तो मुझे तुझ पे एतबार रहा,
अब दुश्मनी है तो दुश्मन की तरह आया-जाया कर।
मैं तेरी चोट को भी अपनी भूल मान लूँ,
मगर तू जबान पे मरहम का नाम न लाया कर।
रिश्ते अगर नहीं रखने तो फ़ासला रख ले,
यूँ रोज़ मिल के मुझे रोज़ न पराया कर।
-रतन कुमार कैथवास