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रोज न पराया कर

                
                                                         
                            अगर ख़फ़ा है तो खुलकर ख़फ़ा रहा कर तू,
                                                                 
                            
मेरे क़रीब रहकर यूँ दिल न दुखाया कर।

अदावतों में भी कुछ तो लिहाज़ रहता है,
जो दिल पे बीत रही है उसे न आज़माया कर।

तू दोस्त था तो मुझे तुझ पे एतबार रहा,
अब दुश्मनी है तो दुश्मन की तरह आया-जाया कर।

मैं तेरी चोट को भी अपनी भूल मान लूँ,
मगर तू जबान पे मरहम का नाम न लाया कर।

रिश्ते अगर नहीं रखने तो फ़ासला रख ले,
यूँ रोज़ मिल के मुझे रोज़ न पराया कर।
-रतन कुमार कैथवास
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37 मिनट पहले

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