लिख के लबों पे ख़ामोशी, चेहरा किताब कर दिया,
जिसने भी गौर से पढ़ा, उसे बेहिसाब कर दिया।
अल्फ़ाज़ सब सँभालकर, आँखों में रख दिए थे मैंने,
उसकी एक निगाह ने, हर राज़ बेहिजाब कर दिया।
लोगों ने सिर्फ़ मुस्कान देखी, बोले कि सब ठीक है,
किसे ख़बर थी वक़्त ने, भीतर ख़राब कर दिया।
एक शाम वो यूँ ही मिला, जैसे कोई अजनबी,
बातें तो कम ही कीं मगर, यादों का चिराग़ फिर जला दिया |
मैंने न कोई शिकवा किया, न इल्ज़ाम उसके नाम लिखा,
अपनी ही तन्हाइयों को, अपना हमराज कर दिया।
रात ने पूछा चाँद से, "इतना उदास कौन है?"
चाँद ने मेरी ओर देखा, बस एक नक़ाब लगा दिया।
सुबह हुई तो आईना, मुझसे नज़रें चुराने लगा,
चेहरे की हर सिलवट ने, दिल को ख़िताब कर दिया।
वर्षों बाद जब लौटकर, उसकी गली से गुज़रा मैं,
सूखा हुआ वो पेड़ भी, जैसे गुलाब कर दिया।
तब जाकर ये समझ आया, इश्क़ कोई अफ़साना नहीं,
जो दर्द को भी जी गया, उसे नायाब कर दिया।
लिख के लबों पे ख़ामोशी, चेहरा किताब कर दिया,
ज़िंदगी ने हर पन्ने पर, वो लाजवाब कर दिया।
-रतन कुमार कैथवास