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पत्थरों से संगीत...

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पत्थरों से संगीत… ये बात सुनकर यक़ीं नहीं आया,
        
                                                    
                            
मगर मदुरई के मीनाक्षी मंदिर ने तो कमाल दिखाया।
पत्थरों के पिलरों से आज भी सरगम निकलती है,
छेड़ो ज़रा तो सा-रे-गा-मा की महफ़िल सजती है।

सोचता हूँ उन वास्तुकारों को आखिर क्या सूझी थी,
किस पत्थर में कौन-सी धुन छिपी है… ये कैसी बूझी थी।
किस पत्थर को किस क्रम में, किस नाप से लगाया होगा,
कहाँ थपकी दी, कहाँ सुर रखा… ये हुनर कैसे पाया होगा।

हम आज भी सुर के लिए सितार और तबला सजाते हैं,
वो पत्थरों को तराशकर उनमें राग बसाते थे।
उनके औज़ार शायद कम थे, मगर हुनर बेहिसाब था,
हमारे पास मशीनें बहुत हैं… पर वैसा जवाब कहाँ था।

ये मंदिर सिर्फ़ पूजा का ठिकाना नहीं, विज्ञान भी बताता है,
जहाँ वास्तुकार पत्थर को भी गाने का हुनर सिखाता है।
कह दो इसे स्थापत्य, संगीत या कारीगरी का साज़,
मगर सच तो ये है… पत्थरों ने ही खोल दिया अपना राज़।
बता दिया दुनिया को कि पत्थर दिल तो क्या,
पत्थर के दिल में भी कुछ संगीत दबा है,
बस उसे उकेरने की समझ हमें फिर से पैदा करनी पड़ेगी |
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
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