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पत्थर तक भी राे पड़ते हैं

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धरती ने हर पीर सही, जो शब्दों में मैं कह न सका,
        
                                                    
                            
सीने में इक पर्वत टूटा, फिर भी अश्क़ मैं बहा न सका।

धूप ने कितने तीर चलाए, छाँव ने भी साथ न दिया,
मन की सूखी इस धरती पर, सावन फिर भी रह न सका।

खाली झज्जर के गीत बहुत से, दरिया के उस पार गए,
लौट के आए स्वर तो लेकिन, मेरा मन कुछ सह न सका।

लहरों ने इतिहास सुनाया, रेत ने लिखी तहरीर नई,
वक़्त की इस खुली किताब को, पूरा मैं भी पढ़ न सका।

शीशम के दरवाज़े पर वो, मौन खड़ी थी गुमसुम-सी,
आँख मिली तो दर्द मिला, पर उससे कुछ कह न सका।

हवा चली तो पत्ते बोले, शाख़ें भी भर आई थीं,
उस ख़ामोशी की भाषा को, कोई लफ़्ज़ गढ़ न सका।

मैं सुनकर वीणा सह न सका, हर झंकार में पीर मिली,
एक-एक कंपन में जैसे, बिछड़े सपनों की नीर मिली।

सात सुरों की उस नगरी में, मौन सबसे ऊँचा निकला,
गीत बहुत थे गाने वाले, दर्द मगर कम ही निकला।

पत्थर तक भी रो पड़ते हैं, प्रेम अगर सच्चा हो तो,
लोहे जैसा मन भी फिर, मोम बने इक क्षण में तो।

मैंने देखा दीप जलाकर, लोग अँधेरा हरते हैं,
कुछ चेहरे मुस्कानें बाँटें, कुछ भीतर ही मरते हैं।

जीवन केवल जीत नहीं है, हारों का भी मान रखो,
जो गिरकर भी उठते जाएँ, उनके भीतर भी प्राण भरो।

धरती ने जो पीर सही है, वही हरियाली बनती है,
आँसू जब आशीष बनें तो, सूखी डाली तनती है।
अब जो पूछो हाल हमारा, इतना ही पैग़ाम लिखो…
दर्द अगर सच की मिट्टी हो,
उसमें उम्मीदों के बीज लिखो।
कल कोई फिर फूल खिलेगा,
आज भले ही नीर लिखो।
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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