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परवरिश तुम्हारी शुरुआत हो सकती है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गलतियाँ इंसान से नहीं,
        
                                                    
                            
उसकी परवरिश से होती हैं।
मैंने यह बात,
एक बूढ़े माली से कही।
वो सूखे हुए पौधे की जड़ों में,
धीरे-धीरे पानी डाल रहा था।
मैंने पूछा…
"अगर पौधा टेढ़ा बढ़ जाए,
तो क्या उसका दोष है?"
वो मुस्कुराया।
बोला…
"दोष ढूँढ़ने से पहले,
यह देखो कि, उसे धूप कितनी मिली थी,
पानी कब मिला था,
और आँधियों में,
उसे सहारा किसने दिया था।"
मैं देर तक चुप रहा।
फिर मैंने कहा…
"जो हुआ सो हुआ...
लेकिन सुधरने और सुधारने के,
कोई रास्ते तो होंगे।
कुछ तो बताओ...
बहुत फ़ज़ीहत हो रही है।"
माली ने अपने हाथों की मिट्टी झाड़ी,
मेरी तरफ़ देखा और बोला…
"सुनो...
हर गलती की जड़, परवरिश नहीं होती,
और हर परवरिश, उम्र भर की सज़ा भी नहीं होती।
पेड़ को, बीज चुनने का अधिकार नहीं मिलता,
लेकिन जड़ें फैलाने का अधिकार,
वक़्त उसे दे देता है।
इंसान भी ऐसा ही है।"
मैंने पूछा…
"तो शुरुआत कहाँ से करूँ?"
वो बोला…
"पहला काम...
अपनी गलती का वकील मत बनो।
दूसरा...
जिससे चोट पहुँची हो,
अगर मुमकिन हो तो उससे माफ़ी माँगो।
माफ़ी हमेशा सामने वाले के लिए नहीं,
कई बार अपने, भीतर की कैद खोलने के लिए भी होती है।
तीसरा...
हर सुबह वही गलती दोहराने से पहले,
बस एक पल रुक जाना।
कई ज़िंदगियाँ,
इसी एक पल से बदल जाती हैं।
और चौथा...
अपने अतीत को, कारण बनाओ,
बहाना नहीं।"
मैंने पूछा…
"अगर लोग,
मेरी पुरानी गलतियाँ,
बार-बार याद दिलाएँ तो?"
माली ने सूखी डाल काटते हुए कहा…
"लोग पेड़ को,
उसके पुराने पत्तों से पहचानते हैं,
मौसम उसे,
नई कोंपलों से पहचानता है।
तुम तय करो,
तुम्हें लोगों की नज़र में जीना है,
या मौसम की तरह बदलना है।"
उस दिन लौटते समय,
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
वही सूखा पौधा,
अब भी सूखा था।
मैंने कहा…
"इसमें तो अभी, कोई फ़र्क नहीं दिख रहा।"
माली हँस पड़ा।
बोला…
"फ़र्क ऊपर नहीं,
नीचे शुरू हुआ है।
जड़ों ने पानी स्वीकार कर लिया है।
याद रखना...
ज़िंदगी में सबसे पहले, आदतें बदलती हैं,
फिर रास्ते बदलते हैं,
और सबसे आख़िर में,
लोगों की राय बदलती है।
इसलिए फ़ज़ीहत से, मत घबराओ।
कई बार बदनामी वह धूल होती है,
जो पुराने रास्तों से लौटते समय,
पैरों में लग जाती है।
उसे झाड़ दो...
अगर इरादा साफ़ हो,
तो परवरिश, तुम्हारी शुरुआत हो सकती है,
लेकिन तुम्हारा चरित्र…
तुम्हारा अंतिम परिचय बनता है।
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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