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पलकों में बदली थी

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पश्मीने जैसी इक रात नशीली थी,
        
                                                    
                            
हुक्म नहीं था हमको, कुछ बात करें उससे |

उस रात के साये में, साँसों की गर्मी थी,
हर धड़कन की आहट में, ख़ामोश सरगर्मी थी।

पुरज़ोर नवाज़िश में, हैरान हुआ तब मैं,
जब सज-धज के वो निकली, जैसे कोई रुपहली चाँदनी थी।

झीलों सी थीं आँखें, पलकों पे बदली थी,
हर एक नज़र में जैसे, मौसम की दिलकशी थी।

लब ख़ामोश थे लेकिन, बातें हज़ारों थीं,
आँखों ने जो कह डाला, अल्फ़ाज़ की ना ज़रूरत थी।

पायल जब ज़रा छमकी, दिल ने सदा दे दी,
लगता था फ़िज़ाओं में, बस उसकी ही दीवानगी थी।

रुख़सार की लाली पर, शबनम भी थी शरमाई,
गुलशन की हर इक कली, उस पल बड़ी फीकी थी।

मैं वक़्त को रोकूँ भी, ये मेरे बस में कब था,
किस्मत की हथेली पर, बस थोड़ी सी खुशी थी।

अब रात तो आती है, पर वैसी नहीं आती,
उस एक मुलाक़ात में, सदियों की रोशनी थी।

आज भी तसव्वुर में, जब नाम तुम्हारा आए,
लगता है मेरे दिल में, वही रेशमी रात ठहरी थी।
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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