नेचर और सिग्नेचर, जल्दी नहीं बदलते हैं,
तूफ़ानों के आगे भी, पर्वत नहीं पिघलते हैं।
आदत की जड़ें गहरी, संस्कारों में पलती हैं,
जब आग में तपते हैं, तब तलवारें बनती हैं।
पहचान मिटाने से, इतिहास नहीं मिटते हैं,
चरित्र के हस्ताक्षर, यूँ ही नहीं बदलते हैं।
चेहरे के मुखौटों से, किरदार नहीं बदलते हैं,
मीठी-मीठी बातों से, विचार नहीं बदलते हैं।
सौ बार कहो झूठ को, सच का रूप देने को,
काफ़ी नहीं है शब्दों से, विश्वास जगाने को।
जो रक्त में स्वाभिमान, बनकर सदा बहते हैं,
वे लोग समय के आगे, घुटने नहीं टेकते हैं।
हथियार बदलने से, रणवीर नहीं बदलते हैं,
मैदान बदलने से, तेवर नहीं बदलते हैं।
जो लक्ष्य साध लेते, वे राह बनाते हैं,
जो ठान लिया मन में, करके दिखाते हैं।
संकल्प के धनी जन, इतिहास बदलते हैं,
पर सिद्धांतों के प्रहरी, सिद्धांत नहीं बदलते हैं।
दौलत के तराज़ू पर, ईमान नहीं तुलते हैं,
सत्ता के इशारों पर, अरमान नहीं झुकते हैं।
जो सत्य की राहों पर, सीना तान चलते हैं,
वे धूप में जलते हैं, तूफ़ान में पलते हैं।
जो राष्ट्र के लिए जीते, वे कभी नहीं डरते हैं,
मिट जाते हैं ख़ुद लेकिन, उसूल नहीं बदलते हैं।
नेचर में हो दृढ़ता तो, पर्वत भी झुकते हैं,
सिग्नेचर में हो दम तो, अध्याय नए लिखते हैं।
बदलाव से मत डरना, परिवर्तन भी ज़रूरी है,
पर रीढ़ बची हो अपनी, तो हर जीत मुकम्मल है।
वक़्त चाहे लाख परखे, हम हार नहीं मानेंगे,
अपने चरित्र से ही, अपनी पहचान बनाएँगे।
हम आँधियों के आगे, दीपक नहीं… अंगार हैं,
हम अपने सिग्नेचर से, इतिहास नए गढ़ते हैं।
-रतन कुमार कैथवास