जलते जज़्बात कहाँ पढ़ूँ,
क्या शाख़ों पर जो पंछी बैठे हैं, उनकी आँखें पढ़ लूँ।
या फिर उन पत्थर हुए चेहरों पर,
सदियों से जो ख़ामोशी की तहरीर लिए फिरते हैं।
क्या दरिया से पूछूँ प्यास का मतलब,
या साहिल की रेत में दबी हुई सदाएँ पढ़ लूँ।
हवा के लब तो कुछ कहते नहीं,
क्या झूमते हुए दरख़्तों की थरथराहट पढ़ लूँ।
धुआँ इतना है कि मंज़र भी धुँधला गया,
क्या राख में दबी चिंगारियों की चाहत पढ़ लूँ।
हर मुस्कान के पीछे एक मौसम कैद मिला,
क्या चेहरों की शिकनों में लिखी इबारत पढ़ लूँ।
कौन कहता है किताबों में ही सच मिलता है,
मैं तो आँखों में उतरकर मुकम्मल दास्ताँ पढ़ लूँ।
ज़माने ने लफ़्ज़ों पर पहरे बिठा रखे हैं,
क्या ख़ामोश निगाहों की बग़ावत पढ़ लूँ।
अगर इंसान समझ में नहीं आते अब,
तो उड़ते परिंदों की वफ़ादारी पढ़ लूँ।
-रतन कुमार कैथवास