वो भटकती पहाड़ी नदी…
आग बहुत है, पानी कम है दरिया में,
कैसे बच पाएगी कश्ती दरिया में।
धूप ने बरसों रेत को, सीने से लगाए रखा,
बादल आए भी तो, ठहरे बस पल भर की छाया में।
प्यास लिए इक गाँव खड़ा था, सूखे कुएँ के आगे,
शहर डुबोता रहा, ख़ुद को रंगीन फ़व्वारों की मायाजाल में।
मैं भी निकला था लेकर, मुट्ठी भर उम्मीदें घर से,
रास्ते बिकते देखे मैंने चौराहों की पावर में।
एक बूढ़ा मल्लाह बोला, "लहरों से डरना मत बेटे,
डूबते अक्सर लोग यहाँ, अपने ही साए की छाया में।"
उसने अपनी आख़िरी मशाल मुझे यूँ सौंप दी,
"रौशनी बचती है अक्सर, सबसे गहरे स्याह उजाले में।"
जब मंज़िल का किनारा, बिल्कुल सामने दिखने लगा,
तूफ़ान सबसे तेज़ उठा, उसी आख़िरी कशमकश के फरेब में।
तब समझ आया, दरिया केवल पानी का नाम नहीं,
कभी आँसू बहते हैं, कभी ख़्वाब उतरते हैं इसकी गहराई में।
आग बहुत है, पानी कम है दरिया में,
फिर भी कुछ लोग उम्र, गुज़ार देते हैं दूसरों की प्यास बुझाने में।
यही वजह है कि, अब लहरों से शिकायत नहीं करता,
जिसके इरादे सच्चे हों, वह अपना दरिया ख़ुद बना लेता है सच्चाई में।
-रतन कुमार कैथवास