तमाम उम्र जिसे अपना मुकम्मल रास्ता न मिला,
वो भी भटकता रहा शहर की इसी रवानी में।
जिसे मुकम्मल होना था किसी दुआ की तरह,
वही अधूरा रहा अपनी ही निशानी में।
वो शख़्स हार के भी हारता नहीं था कभी,
अजीब आग थी उसके लहू की रवानी में।
किसी ने दर्द को पढ़कर भी बात नहीं समझी,
किताब बंद ही रखी गई ज़िंदगानी में।
जो अपने हिस्से का सूरज तलाश करता रहा,
वही जलता रहा उम्र भर इस वीरानी में।
-रतन कुमार कैथवास