सफ़र तेरा आसान तो न होगा,
मुझे साथ ले लो तो अच्छा होगा।
धूप कहीं तेरे क़दमों को थका दे अगर,
मैं अपनी हथेलियों से थोड़ी-सी छाँव बुन दूँगा।
रास्ता चाहे जितना पथरीला निकले,
तेरे हिस्से के कुछ काँटे मैं चुन लूँगा।
जब पहली रात किसी अनजाने शहर में ठहरोगे,
खिड़की से झाँकता चाँद भी अजनबी लगेगा।
मैं कोई बड़ी बात नहीं करूँगा,
बस इतना कहूँगा…
"सुबह यहीं से निकलेगी, हिम्मत मत हारना।"
हो सकता है मंज़िल तक पहुँचने से पहले
कई अपने रास्ता बदल लें,
कुछ हाथ बीच सफ़र में छूट जाएँ,
कुछ वादे मौसम की तरह बदल जाएँ।
तब भी यक़ीन रखना,
हर मुसाफ़िर अकेला नहीं होता।
जब प्यास बहुत लगे और दरिया दूर दिखाई दे,
मैं उम्मीद की एक बूँद बचाकर रखूँगा।
जब तेरी आँखों में हार उतरने लगे,
मैं तेरी ही पुरानी जीतों का किस्सा सुनाऊँगा।
याद है, बचपन में जब चलना सीखा था,
गिरने से ज़्यादा किसी का हाथ पकड़ना अच्छा लगता था।
ज़िंदगी भी वैसी ही राह है,
यहाँ मंज़िल से पहले, हमसफ़र की अहमियत, समझ आती है।
और अगर कभी ऐसा वक़्त भी आए,
कि मुझे तुझसे पहले रुकना पड़े,
तो मेरी बात याद रखना…
रास्ते मत छोड़ना,
क्योंकि कुछ दुआएँ साथ चलती हैं,
भले ही लोग पीछे रह जाएँ।
सफ़र तेरा आसान तो न होगा,
मुझे साथ ले लो तो अच्छा होगा।
दो क़दम मैं चलूँगा, दो क़दम तुम बढ़ाना,
फिर देखना…
मंज़िल से ज़्यादा ख़ूबसूरत
हमारा साथ हो जाएगा।
-रतन कुमार कैथवास