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मेरी कीमत ये खानदानी है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कदम-कदम पे मिली धूप इम्तिहानों की,
        
                                                    
                            
मगर ये प्यास भी जीने की मेहरबानी है।

हवा ने लाख बुझाने की कोशिशें कीं मगर,
मेरे चिराग़ में अब भी वही रवानी है।

मैं अपने ज़ख़्म छुपाता नहीं ज़माने से,
मेरे हर दर्द में इक दास्ताँ पुरानी है।

जो मेरे ख़्वाब की कीमत लगाते फिरते हैं,
उन्हें क्या ख़बर मेरी कीमत ये खानदानी है।

नदी के साथ बहा तो सभी ने राह कही,
जो रेत पर भी चला… वो मेरी रवानी है।

मैं हार जाऊँ, ये मुमकिन नहीं है ऐ दुनिया,
मेरी शिकस्त में भी जीत की निशानी है।

जहाँ भी धूप मिले, मैं वहीं ठहरता हूँ,
मुझे तो आग के रिश्ते की पासबानी है।
-रतन कुमार कैथवास
18 घंटे पहले
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