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मेरी चाँद रात

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुझे सोचना,
        
                                                    
                            
मेरी चाँद रात,
तुझे देखना,
मेरी ईद है।

बताओ...
कैसे हालात आ गए हैं?
एक ज़माना था,
जब ईद का चाँद,
आसमान में ढूँढ़ा जाता था।
अब...
मैं हर शाम,
तुम्हारे ऑनलाइन आने का,
इंतज़ार करता हूँ।

एक दिन,
दादी ने पूछा…
"बेटा,
आजकल छत पर,
चाँद देखने नहीं जाते?"
मैंने हँसकर कहा…
"दादी,
अब चाँद
आसमान में नहीं मिलता।"
दादी मुस्कुराईं।
बोलीं,
"अच्छा...
तो कहाँ मिलता है?"
मैंने मोबाइल की स्क्रीन,
धीरे से पलट दी।
कुछ नहीं कहा।
दादी सब समझ गईं।
वो बोलीं…
"इश्क़ बड़ा अजीब होता है।
पहले लोग चाँद देखकर
महबूब को याद करते थे।
आजकल,
महबूब को देखकर,
चाँद भूल जाते हैं।"
मैं चुप रहा।

क्या कहता?
सच तो यही था।
तुम्हारा एक छोटा-सा,
"कैसे हो?" कह देना
पूरा दिन,
रोशन कर देता था।
और तुम्हारा,
एक दिन चुप रह जाना,
पूरी रात,
अमावस बना देता था।
एक शाम,
तुमने पूछा…
"इतना क्या देखते रहते हो मुझे?"
मैंने कहा…
"डरता हूँ।"
तुम हँस पड़ी।
"मुझसे?"
मैंने सिर हिलाया।
"नहीं...
वक़्त से।
कहीं ऐसा न हो,
कि ये लम्हे,
सिर्फ़ याद बनकर रह जाएँ।"
तुमने कुछ नहीं कहा।
बस मुस्कुराईं।
और वही मुस्कान,
उस दिन की,
सबसे बड़ी दुआ बन गई।
बरसों बाद,
जब ईद आई,
लोग नए कपड़ों में,
एक-दूसरे को गले लगा रहे थे।
मैंने भी,
आसमान की तरफ़ देखा।
चाँद पूरा था।
फिर भी,
दिल अधूरा था।
तभी भीतर से,
एक आवाज़ आई…
"तुझे सोचना मेरी चाँद रात,
तुझे देखना मेरी ईद है..."
मैं मुस्कुरा दिया।
क्योंकि समझ गया था,
कुछ रिश्ते,
कैलेंडर की तारीख़ों से नहीं चलते।
उनकी ईद,
एक मुलाक़ात होती है,
उनका रमज़ान,
एक इंतज़ार,
और उनका चाँद,
सिर्फ़ एक चेहरा।
बस...
यही तो हालात हैं।
जहाँ लोग पूछते हैं…
"ईद का चाँद देखा?"
और दिल चुपके से जवाब देता है…
"नहीं...
जिसे देखना था,
वो आज भी मेरी दुआओँ के आसमान पर,
बादलों के पीछे कहीं छिपा हुआ है।"
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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