गुलाब के काँटों को जब चोट लगे तो,
मरहम कौन बने?
कहते हैं, ये तो फूलों के सेनापति हैं।
एक सुबह बाग़ के माली ने देखा,
गुलाब तो मुस्कुरा रहा था,
मगर उसके काँटे झुके हुए थे।
रात किसी ने फूल तोड़ने की कोशिश में
उन्हीं काँटों को लहूलुहान कर दिया था।
लोगों ने फूल की ख़ुशबू की तारीफ़ की,
रंगों पर शेर कहे, तस्वीरें उतारीं,
पर किसी ने यह न पूछा…
जिसने फूल की हिफ़ाज़त की,
उसके ज़ख़्म कितने गहरे हैं?
हवा ने काँटों से कहा,
"तुम इतने कठोर क्यों हो?"
काँटे मुस्कुराकर बोले…
"हमारी सख़्ती किसी से नफ़रत नहीं,
किसी मासूम की हिफ़ाज़त की क़ीमत है।"
एक नन्ही कली ने डरते-डरते पूछा,
"क्या तुम्हें दर्द नहीं होता?"
काँटे हँस पड़े…
"सेनापति अगर अपने घाव गिनने लगे,
तो क़िला कब तक बच पाएगा?"
बरसात आई तो बूँदें
उनके ज़ख़्मों पर ठहर गईं।
ऐसा लगा जैसे आसमान ख़ुद
उन पर मरहम रख रहा हो।
तब माली ने धीरे से कहा…
"याद रखना,
जो सबसे मज़बूत दिखाई देते हैं,
उन्हें भी कभी-कभी सहारे की ज़रूरत होती है।
कभी पत्थर जैसे लोग भी,
अंदर से मोम निकला करते हैं।"
उस दिन से उसने फूलों के साथ-साथ
काँटों की भी देखभाल शुरू कर दी।
क्योंकि उसे समझ आ गया था…
सिर्फ़ ख़ुशबू को बचाना काफ़ी नहीं,
उसकी रखवाली करने वालों को भी, बचाए रखना पड़ता है।
गुलाब के काँटों को जब चोट लगे तो,
मरहम कौन बने?
शायद वही,
जो फूलों की ख़ुशबू से आगे बढ़कर,
उन अनदेखे पहरेदारों का दर्द भी पढ़ सके।
-रतन कुमार कैथवास