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मंजिल का पुल

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इतना शीतल माहौल मंज़ूर नहीं,
        
                                                    
                            
माहौल गर्म रहे, तब ही काम करने का मज़ा है।
इतने में वो बोल पड़ी…
"कोई स्क्रू तो नहीं ढीला हो गया है?"
मैंने हँसकर इतना ही कहा,
"ढीला नहीं, बस सोच का पहिया तेज़ घूमता है।
जो भीड़ के साथ चलता है,
उसे हर तेज़ कदम पागलपन ही लगता है।"
सन्नाटों में कहाँ इंक़लाब जन्म लेते हैं,
बिजलियाँ हमेशा बादलों के शोर में पलती हैं।
आराम की गोद में बैठे लोग क्या जानें,
चिंगारियाँ ही एक दिन मशालों में बदलती हैं।
तुम उसे सनक कहो, मैं उसे ज़िद कहता हूँ,
तुम उसे ख़तरा समझो, मैं उसे मंज़िल का पुल कहता हूँ।
लोहे को पिघलाने वाली आग भी,
पहले दुनिया को सिर्फ़ धुआँ ही लगती है।
मैंने कहा,
"अगर स्क्रू ढीला होता, तो सपने इतने कसे हुए न होते।
दीवारें देखकर लौट आता,
पहाड़ों से टकराने का इरादा न होता।"
जो दुनिया बदलने निकलते हैं,
उन पर पहले, हँसी ही उड़ाई जाती है।
तारीख़ गवाह है,
हर नई सोच को शुरुआत में 'पागलपन' ही बताया जाता है।
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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