सच की आग में ख़ुद को जलाना नहीं है,
बस इतना करना है कि, झूठ की ठंडी छाँव में बैठना नहीं है।
जो कहो, वही सच होने का साहस रखो,
ज़ुबान को मौसम नहीं, चरित्र का आईना होना चाहिए।
एक दिन मैं पत्थरों की मंडी में गया,
संगमरमर भी था, चूना भी था, और ग्रेनाइट भी।
कारीगर मुस्कुराकर बोला…
"हर पत्थर चमकता ज़रूर है, मगर हर पत्थर भरोसा नहीं देता।"
उसने ग्रेनाइट पर तेल की कुछ बूँदें गिराईं,
बूँदें देर तक उसके सीने पर ठहरी रहीं,
मगर भीतर उतरने का रास्ता न मिला।
पत्थर ने अपनी फितरत नहीं बदली,
अपनी मज़बूती का सौदा नहीं किया।
तब उसने मेरी ओर देखकर कहा…
"इंसान की सोच भी ऐसी ही होनी चाहिए।
बुराई सामने आए, मगर भीतर जगह न पाए।
लालच दस्तक दे, मगर दरवाज़ा खुलने न पाए।"
मैं लौट आया उस सीख को साथ लेकर।
अब जब कोई नफ़रत बोने की कोशिश करता है,
मैं ग्रेनाइट की तरह ख़ामोश हो जाता हूँ।
क्योंकि हर आवाज़ का जवाब देना ज़रूरी नहीं,
हर गंदगी को अपने भीतर उतारना भी ज़रूरी नहीं।
लोग अक्सर कहते हैं…
"थोड़ा समझौता कर लो, ज़माना ऐसा ही है।"
मैं मुस्कुराकर कहता हूँ…
"ज़माने का रंग बदल सकता है,
मगर मेरे विचारों का पत्थर नहीं।"
सच का रास्ता अंगारों से होकर गुज़रता है,
मगर वही रास्ता मंज़िल तक भी पहुँचाता है।
झूठ की सड़क भले चिकनी दिखाई दे,
उसका पुल पहली आँधी में ढह जाता है।
इसलिए अपने मन को ग्रेनाइट जैसा बनाओ…
जहाँ ईमान की चमक हो,
विवेक की कठोरता हो,
और चरित्र की ऐसी सतह हो,
कि छल, कपट और स्वार्थ का कोई दाग,
भीतर तक उतर ही न सके।
क्योंकि जिस दिन इंसान की सोच,
ग्रेनाइट की तरह अडिग हो जाती है,
उस दिन दुनिया उसे बदलने की कोशिश छोड़ देती है,
और वही इंसान,
अपने सच से दुनिया बदलने निकल पड़ता है।
-रतन कुमार कैथवास