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मन की सफेदी

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहाड़ों की बर्फ़बारी देखकर,
        
                                                    
                            
मुझे कुछ ऐसा लग रहा है,
जैसे अपने ही आप से,
अनजान ना हो जाऊँ।

इन सफ़ेद वादियों में,
नाम नहीं, एहसास चलते हैं,
यहाँ पहचान से ज़्यादा,
साँसों की भाप दिखाई देती है।

मन करता है,
कि सारी उम्र की भागदौड़,
किसी चीड़ के पेड़ के नीचे रख दूँ,
और बर्फ़ की चादर ओढ़कर,
कुछ देर सिर्फ़ ख़ामोशी सुनूँ।

कौन हूँ मैं?
क्या हूँ मैं?
इन सवालों का शोर भी,
इन पहाड़ों तक आते-आते,
धीमे-धीमे जम जाता है।

हर गिरती हुई बर्फ़,
जैसे कह रही हो…
"खुद को मिटाए बिना,
नई तस्वीर नहीं बनती।"

मैंने देखा,
पहाड़ अपनी ऊँचाई का,
कभी ऐलान नहीं करते,
फिर भी बादल,
उनके कंधों पर सिर रखकर रो लेते हैं।
शायद इसलिए,
मुझे भी लग रहा है,
कि शहर का शोर,
चेहरे की पहचान,
नाम का अहंकार…
सब यहीं कहीं छोड़ दूँ।

फिर किसी सुबह,
सूरज की पहली किरण के साथ,
एक नया इंसान बनकर लौटूँ,
जिसके भीतर शिकायतें कम हों,
सुकून ज़्यादा हो।

क्योंकि कभी-कभी,
खुद को पाने का रास्ता,
खुद से थोड़ा-सा अनजान होकर ही गुज़रता है।
और सच कहूँ…
पहाड़ों की बर्फ़बारी देखकर,
मेरा मन खोना नहीं चाहता,
वह तो बस उस ख़ामोशी में घुल जाना चाहता है,
जहाँ इंसान अपने नाम से नहीं,
अपने मन की सफ़ेदी से पहचाना जाता है।
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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