विज्ञापन

क्या नाम दूँ अब मैं

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस वीराने मौसम की रंजो-ग़म को क्या नाम दूँ अब मैं,
        
                                                    
                            
हवा भी चुप है, कैसे इस ख़ामोशी का पैग़ाम दूँ अब मैं।

कैसे कह दूँ साहिल का इशारा तो समझ, मगर कह नहीं सकता,
लहरों में छुपा कोई राज़ है, खुलकर उसका नाम नहीं सकता।

उस वीरान टापू पर बहुत-सी परियाँ रहती हैं शायद,
हर रात किसी अनजाने मुसाफ़िर की राह तकती हैं शायद।

तू ज़रा पता कर, कहीं वहाँ वो तुम्हें तो ढूँढ नहीं रही,
चाँदनी में बैठकर तेरी आहट तो सुन नहीं रही।

समंदर से पूछना, किसके लिए लहरें बार-बार आती हैं,
किसके नाम की सीपियाँ से साहिल पर लिखकर लौट जाती हैं।

कहीं कोई परी तेरी तस्वीर आँखों में लिए बैठी न हो,
कहीं तेरे आने की उम्मीद में अब भी दीया जलाती न हो।

मैं नाम नहीं लूँगा, इशारों में पूरी बात कह दूँगा,
अगर वो तुझे ढूँढ रही होगी, तो तेरा पता दे दूँगा।

बस इतना समझ लेना इस वीराने मौसम की रवानी में,
कोई तेरा इंतज़ार करता है उस टापू की वीरानी में।
-रतन कुमार कैथवास
8 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10489 कविताएं

View Profile