काँटे किससे सीखेंगे, फूलों-सा महकना,
पत्थर के सीने में, कैसे हो प्रेम का बहना।
जो दूसरों के दर्द पर, हँसते रहे सदा,
उनसे क्या उम्मीद करें, इंसानियत का रहना।
कुछ तो बताओ मेरे कान्हा, क्या यही है जीवन का गहना?
क्या अच्छे लोग ही, आख़िर ख़राब होते हैं,
क्या सच्चे लोग भी, झूठ के गुलाम होते हैं?
जो स्वार्थ की ख़ातिर, रिश्तों को बेच देते हैं,
क्या ऐसे लोग भी, कभी निष्काम हो सकते हैं?
कुछ तो बताओ मेरे कान्हा, क्या पत्थर भी शंकर हो सकते हैं?
क्या मतलबी मानसिकता वाले, सज्जन बन सकते हैं,
क्या स्वार्थ के सागर में डूबे लोग, चंदन बन सकते हैं?
जो हर रिश्ते को, अपने फ़ायदे से तौलते हैं,
क्या ऐसे लोग, किसी के दिल का दर्पण बन सकते हैं?
कुछ तो बताओ मेरे कान्हा, क्या काँटे भी गुलशन बन सकते हैं?
जो मतलब से मिलते हैं, क्या अपने बन सकते हैं,
जो पीठ पीछे वार करें, क्या सपने बन सकते हैं?
जुबाँ पर प्रेम रखकर, दिल में कपट सजाने वाले,
क्या झूठ के सौदागर, कभी नेक इरादों वाले बन सकते हैं?
कुछ तो बताओ मेरे कान्हा, क्या विषधर भी चंदन बन सकते हैं?
जो दूसरों के दर्द में भी, अपना लाभ तलाशते हैं,
जो आँसू देखकर भी हँसते हैं, क्या वे संवेदना पालते हैं?
जो सज्जनता का मुखौटा पहनकर, दुनिया को छलते हैं,
क्या ऐसे लोग कभी, सच्चाई की राह पर चलते हैं?
कुछ तो बताओ मेरे कान्हा, क्या पत्थर भी पिघल सकते हैं?
क्या वक़्त के साथ, लोगों के संस्कार बदल जाते हैं,
क्या स्वार्थ के बादल, छँटने पर विचार बदल जाते हैं?
जो फ़ितरत से ही, दूसरों का हक़ छीनने के आदी हैं,
क्या आत्मबोध होने पर, उनके व्यवहार बदल जाते हैं?
कुछ तो बताओ मेरे कान्हा, क्या इंसान सचमुच सँभल जाते हैं?
तुम कहते हो, हर प्राणी में सुधार की गुंजाइश है,
फिर क्यों मन में छल-कपट, क्यों नफ़रत की आज़माइश है?
क्या प्रेम से जीत सकते हैं, हम स्वार्थ में डूबे मन को,
या कुछ चेहरों के पीछे, जन्मों पुरानी ख़्वाहिश है?
कुछ तो बताओ मेरे कान्हा, क्या बदलना ही मनुष्य की बंदगी है?
-रतन कुमार कैथवास