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किसे पुकारूँ मैं...

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम ही हिन्दी, तुम ही बिंदी,
        
                                                    
                            
तुम ही बहाव, तुम ही ठहराव।
तुम ही सवाल, तुम ही जवाब,
तुम ही तन्हा, तुम ही भीड़।
तुम ही आकाश, तुम ही पाताल,
तुम ही बर्फ, तुम ही ज्वाला।
तुम ही मिर्ची, तुम ही मिश्री,
तुम ही तुलसी, तुम ही सहजन।
तुम ही सन्नाटा, तुम ही कलरव,
तुम ही काँटा, तुम ही गुलाब।
तुम ही सूरज, तुम ही छाया,
तुम ही संध्या, तुम ही प्रभात।
तुम ही प्यास, तुम ही दरिया,
तुम ही मरहम, तुम ही घात।
तुम ही ख़्वाब, तुम ही ताबीर,
तुम ही रस्ता, तुम ही मुकाम।
तुम ही धड़कन, तुम ही साँसें,
तुम ही ख़ामोश, तुम ही आवाज़।
तुम ही मिट्टी, तुम ही खुशबू,
तुम ही राग, तुम ही साज़।
तुम ही पूजा, तुम ही सज्दा,
तुम ही मधुबन, तुम ही मधुशाला।
तुम ही सावन, तुम ही मरुथल,
तुम ही बदली, तुम ही धूप।
तुम ही चंदन, तुम ही वंदन,
तुम ही रंग, तुम ही रूप।
तुम ही मोती, तुम ही सीपी,
तुम ही लहर, तुम ही तूफ़ान।
तुम ही अक्षर, तुम ही भाषा,
तुम ही कविता, तुम ही छंद।
तुम ही अर्थ, तुम ही अनुभूति,
तुम ही आरंभ, तुम ही अंत।
तुम ही कागज़, तुम ही स्याही,
तुम ही लेखन, तुम ही ज्ञान।
तुम ही दूरी, तुम ही नज़दीकी,
तुम ही विरह, तुम ही मिलन।
तुम ही धूप में ठंडी छाया,
तुम ही मन का स्पंदन।
तुम ही कारण, तुम ही परिणाम,
तुम ही जीवन, तुम ही प्राण।
और अंत में...
तुम ही खोज, तुम ही मंज़िल,
तुम ही पथिक, तुम ही राह।
तुम ही विश्वास, तुम ही साहस,
तुम ही सागर, तुम ही थाह।
जब हर ओर तुम्हीं दिखाई दो,
तो फिर किसे पुकारूँ मैं…
तुम ही शब्द, तुम ही अर्थ,
तुम ही मेरी हर एक चाह।
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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