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किरदार से तय होता है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये जो सिफ़र से सैकड़े तक का सफ़र है,
        
                                                    
                            
इसका कोई फ़ॉर्मूला है क्या?
मेरे दोस्तों को जानना है,
कोई शॉर्टकट चाहते हैं।
हमें तो हमेशा, लॉन्ग कट ही पढ़ाया गया है।
एक दिन चौपाल पर यही सवाल उठा,
सबकी जेब में सपने थे,
मगर सबकी ज़ुबान पर एक ही बात थी…
"कोई आसान रास्ता बता दो।"
एक लड़का बोला…
"सुना है रातों-रात लोग सितारे बन जाते हैं।"
दूसरा हँसकर बोला…
"हमें भी वही नुस्ख़ा चाहिए,
मेहनत वाला अध्याय छोड़ दो।"
उसी वक़्त गाँव का एक बूढ़ा कारीगर,
अपनी पुरानी साइकिल से उतरा।
हाथों में छाले थे,
माथे पर पसीना था,
मगर चेहरे पर सुकून लिखा था।
उसने सबकी बातें सुनीं,
फिर ज़मीन पर एक बीज रखकर बोला…
"अगर शॉर्टकट होता,
तो ये बीज कल सुबह बरगद बन जाता।
मगर इसे भी पहले मिट्टी में दबना पड़ता है,
अँधेरे में रहना पड़ता है,
बारिश सहनी पड़ती है,
तब कहीं जाकर छाँव मिलती है।"
हमने पूछा…
"तो क्या कोई फ़ॉर्मूला नहीं है?"
वो मुस्कुराया और बोला…
"है…
लेकिन किताबों वाला नहीं,
ज़िंदगी वाला।"
इरादा + ईमानदारी + लगातार मेहनत + धैर्य = कामयाबी।
फिर उसने अपनी हथेली दिखाई,
पुराने ज़ख़्मों के निशान अब भी थे।
बोला…
"ये मेरे सर्टिफिकेट हैं।
इन्हें किसी कॉलेज ने नहीं दिया,
वक़्त ने दिया है।"
उस दिन समझ आया,
शॉर्टकट अक्सर मंज़िल तक नहीं,
भटकाव तक ले जाते हैं।
लॉन्ग कट थकाता ज़रूर है,
मगर रास्ते में इंसान भी बना देता है।
अब जब कोई पूछता है…
"सिफ़र से सैकड़े तक कैसे पहुँचा जाए?"
मैं मुस्कुराकर इतना ही कहता हूँ…
"गिनती बदलने का कोई शॉर्टकट नहीं,
आदतें बदलने का हौसला चाहिए।
क्योंकि सिफ़र से सैकड़ा बनने का सफ़र,
क़दमों से नहीं,
किरदार से तय होता है।"
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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