वो कहती है…
“तुम मेरे ख़्वाब में आए थे,
उस घड़ी जब रात, चाँद को विदा कर रही थी।“
मैंने हल्की-सी मुस्कान के साथ पूछा,
“उस मुलाक़ात का अंजाम क्या हुआ?”
वो कुछ देर ख़ामोश रही,
जैसे उसके अल्फ़ाज़ भी उस एहसास को
बयाँ नहीं करना चाह रहे थे।
वो बोली…
“शहर की सारी गलियाँ सो रही थीं,
बस एक पुराना चराग़ अभी भी जल रहा था।
तुम उसी की रोशनी में बैठे,
किसी अधूरी ग़ज़ल का आख़िरी मिसरा लिख रहे थे।“
मैंने तुम्हें आवाज़ दी,
मगर तुमने पलटकर नहीं देखा।
तुम बस मुस्कुराए,
जैसे तुम्हें पहले से मालूम हो,
कि मैं आने वाली हूँ।
मैंने पूछा…
"इतनी रात गए यहाँ क्यों बैठे हो?"
तुमने आसमान की तरफ़ देखा और कहा…
"कुछ रिश्ते सूरज की रोशनी में नहीं,
चाँद के ढलने के बाद समझ आते हैं।"
इतने में अज़ान की पहली सदा गूँजी,
हवा ने पेड़ों की शाख़ों को छुआ,
और शहर की तन्हाई धीरे-धीरे
सुबह की चादर ओढ़ने लगी।
मैंने तुम्हारा हाथ थामना चाहा,
मगर उसी पल मेरी आँख खुल गई।
हथेली खाली थी,
लेकिन उसकी गर्माहट अब भी बाकी थी।
मैं देर तक सोचती रही,
ये सिर्फ़ एक ख़्वाब था,
या किसी दुआ की ताबीर।
तब से जब भी चाँद ढलता है,
मैं उसी गली से गुज़रती हूँ।
वहाँ अब कोई बैठा नहीं मिलता,
लेकिन एक खाली बेंच आज भी,
किसी का इंतज़ार करती दिखाई देती है।
शायद मोहब्बत का सबसे ख़ूबसूरत रूप यही है…
जहाँ मुलाक़ातें हमेशा हक़ीक़त में नहीं होतीं,
कुछ लोग ख़्वाबों में आकर भी…
ज़िंदगी भर की याद बन जाते हैं।
-रतन कुमार कैथवास