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खामोशी में आवाज बहुत है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ सपनों में आग बहुत है,
        
                                                    
                            
दरिया में भी सैलाब बहुत है,
आँखों में हमराज़ बहुत है,
ख़ामोशी में आवाज़ बहुत है।

खुलकर जीने वाले पूछें,
इसमें तो ललकार बहुत है,
राह कठिन है, मंज़िल दूर,
फिर भी दिल में प्यार बहुत है।

राख हुई जो कल तक सारी,
उसमें भी अंगार बहुत है,
झुकने से इनकार किया तो,
सीने में अब धार बहुत है।

तूफ़ानों से कह दो जाकर,
हममें भी अब जान बहुत है,
गिरकर फिर से उठने वाले,
उनमें ही अरमान बहुत है।

जिसको दुनिया आग कहे है,
हमको उससे प्यार बहुत है,
ज़िंदगी तो खुलकर जी लो सब,
जीने में ही सार बहुत है।
-रतन कुमार कैथवास
20 घंटे पहले
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