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कल का आफ़ताब हो

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पूर्णिमा का महताब हो,
        
                                                    
                            
समय से आगे चलने वाले आफ़ताब हो,
अँधेरों में भी उजाला बाँटते रहो,
तुम अपने ही ख़्वाबों के जवाब हो।

जहाँ रास्ते थककर ठहर जाएँ,
वहाँ तुम चलने का नया हिसाब हो,
ज़माना चाहे जितना रोकता रहे,
तुम अपने इरादों की किताब हो।

न झुको किसी मौसम की आँधी में,
न किसी डर के तुम गुलाम हो,
जो सच की राह में अकेले चल पड़े,
तुम उसी सफ़र का मुक़ाम हो।

तुम्हारी ख़ामोशी भी असर रखती है,
तुम हर सवाल का बेहिसाब जवाब हो,
तुम्हें देखकर वक़्त भी ठहर जाए,
तुम आने वाले कल का आफ़ताब हो।
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
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