कैसे बनाऊँ काग़ज़ की नाव, कि दरिया में रवानी बहुत है,
दिल को बहा ले जाए जो, उस लहर में कहानी बहुत है।
हासिल नहीं है मुझको तेरी आँखों का वो आईना,
फिर भी इन आँखों में तेरी एक तस्वीर पुरानी बहुत है।
कैसे दीदार करूँ मैं इन भीगी हुई बरसातों का,
हर बूँद में तेरी यादों की कोई निशानी बहुत है।
साहिल पे खड़ा हूँ, मगर डूबने का डर भी नहीं,
इस दिल के समंदर में तेरी मेहरबानी बहुत है।
तू सामने नहीं, फिर भी महसूस होता है हर पल,
तेरी ख़ामोशी में भी एक आवाज़ सुहानी बहुत है।
मैं प्यास लिए फिरता हूँ तेरे शहर की गलियों में,
कहने को तो दरिया है, मगर प्यास पुरानी बहुत है।
किससे कहूँ कि कितना ज़रूरी है तेरा मिलना,
दुनिया के लिए कम सही, मेरे लिए ज़िंदगानी बहुत है।
-रतन कुमार कैथवास