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कहिए मेरे हक्का नूडल, ये कैसी रवानी है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नए एंटीना लग गए, मगर सोच वही पुरानी है,
        
                                                    
                            
नए ट्रांसमीटर आ गए, मगर नफ़रत की वही कहानी है।
तरक़्क़ी के दावे हैं, विज्ञान की रवानी है,
पर दिमाग़ों में अब भी, अज्ञान की हुकूमत पुरानी है।
कहिए मेरे हक्का नूडल, ये कैसी नई रवानी है?

आवाज़ की रफ़्तार बढ़ी, मगर विचारों में अँधेरा है,
हर चैनल पर शोर बहुत, सच का चेहरा ठहरा है।
झूठ को सच बतलाने का कारोबार खूब चलता है,
विवेक का दीप बुझा हुआ, अफ़वाहों का डेरा है।
नई तकनीक के हाथों में क्यों नफ़रत का बसेरा है?

संदेश नए, अंदाज़ नए, पर ज़हर वही पुराना परोसा है,
नफ़रत के व्यापारियों ने हर चौखट पर दोषा है।
कहीं धर्म के नाम पर झगड़ा, कहीं जाति की दीवारें,
इंसानियत को बाँटकर किसने कैसा लाभ जोड़ा है?
बतलाओ, इस तरक़्क़ी ने आख़िर किसका मन सँवारा है?

उपग्रहों ने छू लिया है आसमान का किनारा,
फिर भी नफ़रत ने क्यों इंसान को इंसान से हारा?
मुट्ठी में दुनिया आ गई, पर दिल हुए हैं छोटे,
ज्ञान के इतने साधन हैं, फिर भी विवेक बेचारा।
तकनीक तो आगे बढ़ी, क्यों पिछड़ा मन हमारा?

एंटीना बदलने से, क्या मानसिकता बदल जाएगी,
नई तरंगों से, क्या नफ़रत की फ़सल जल जाएगी?
जब तक, सवाल पूछने की हिम्मत नहीं जगेगी,
मूर्खता, नए मुखौटों में फिर लौटकर आएगी।
मशीनें बदलने से नहीं, सोच बदलने से नई सुबह आएगी।
-रतन कुमार कैथवास
3 दिन पहले
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