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काम करने की जिद

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सबने समझाया था मुझको,
        
                                                    
                            
रास्ता ये छोड़ दो तुम।
दूर तक काँटे ही काँटे हैं,
अब ये सपना तोड़ दो तुम।

मैंने हँसकर इतना बोला,
राह का फ़ैसला सफ़र तय करेगा।
मंज़िल अगर मेरे नाम नहीं लिखी,
तो मेरा हौसला उसे लिखेगा।

दिन कई पत्थर उठाए मैंने,
रात कई आँसू भी पीए।
लोग तमाशा देखते रहे,
हमने मगर कदम न रोके।

एक बुज़ुर्ग मुसाफ़िर बोला,
"बेटा, लौट चलो, देर हुई।"
मैंने कहा, "जो लौट गया,
उसकी तो हर कोशिश बेकार हुई।"

जब आख़िरी मोड़ नज़र आया,
साँस भी जैसे थमने लगी।
वहीं ज़मीं पर तक़दीर मेरी,
धीरे-धीरे लिखने लगी।

जिन हाथों ने मना किया था,
वो हाथ दुआ में उठते थे।
कल तक जो हँसते थे मुझ पर,
आज वही मेरे किस्से कहते थे।

तब समझ आया एक सच ये,
किस्मत पत्थर की लकीर नहीं।
मेहनत की स्याही से लिख दो,
ऐसी कोई तक़दीर नहीं।

मिलना अगर आसान होता,
तो उसकी कीमत भी क्या होती।
इतिहास वही लोग लिखते हैं,
जिनकी काम करने की ज़िद,
मुक़द्दर से बड़ी होती।
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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