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जुबान से पहले दिल बोलता है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इतने सलीके से मेरा बात करना, उसको कतई पसंद नहीं है,
        
                                                    
                            
कहती है… "नॉर्मल बात किया करो,
इतने सलीके से बात करने से, सब कुछ बनावटी लगता है।"
मैंने हँसकर पूछा…
"अच्छा, तो अब मोहब्बत का भी, कोई ड्रेस कोड होता है क्या?"

वो बोली…
"मोहब्बत में अल्फ़ाज़ नहीं,
अपनापन दिखाई देना चाहिए।"
मैंने उस दिन पहली बार,
अपने लफ़्ज़ों का मुलम्मा उतार दिया,
कुछ वाक्य टेढ़े बोले,
कुछ बातें अधूरी छोड़ दीं,
कुछ हँसी, बिना वजह हँस दी।

वो मुस्कुराई और बोली…
"बस... अब लग रहे हो अपने जैसे।"
मैंने कहा…
"मैं तो हमेशा से ऐसा ही था,
बस डर था कि कहीं,
बदतमीज़ न समझ लिया जाऊँ,
इसलिए तहज़ीब को थोड़ा ज़्यादा ओढ़ लिया था।"

वो बोली…
"तहज़ीब अच्छी चीज़ है,
लेकिन जब हर जुमला, किताब से निकला हुआ लगे,
तो दिल डर जाता है।
रिश्ते शब्दकोश से नहीं,
धड़कनों से लिखे जाते हैं।"

मैंने चाय का कुल्हड़ उठाया,
एक घूँट लिया और हँसते हुए कहा…
"तो फिर सुनो...
आज से 'आप' कम, 'तुम' ज़्यादा,
लफ़्ज़ कम, शरारत ज़्यादा,
और सफ़ाई कम, सच्चाई ज़्यादा।"

वो खिलखिलाकर बोली…
"लो... अब आया न मज़ा।
अब ऐसा लग रहा है कि,
तुम मुझसे बात कर रहे हो,
किसी इंटरव्यू का जवाब नहीं दे रहे।"

मैंने उसकी आँखों में देखकर कहा…
"जानती हो,
हम जैसे लोग बनावटी नहीं होते,
बस बचपन से, इतना सिखा दिया गया कि,
किसी का दिल न दुखे,
इसलिए हर शब्द तौलकर, बोलने की आदत पड़ गई।"

वो धीरे से मुस्कुराई,
मेरे कंधे पर हल्की-सी चपत लगाकर बोली…
"मुझे तौले हुए अल्फ़ाज़ नहीं चाहिए,
मुझे तुम्हारा बिखरा हुआ सच पसंद है।
रिश्ते वहाँ सबसे ख़ूबसूरत लगते हैं,
जहाँ ज़ुबान से पहले दिल बोलता है।"
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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