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जिसने जग की छत बांधी है, उसका घर बेछत ही होगा

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लगता है, ईश्वर भी मज़दूर है, दिन-रात मेहनत करता होगा,
        
                                                    
                            
लोहे की छाती पर रखकर हथौड़ा, सपनों को गढ़ता होगा।
वह वेल्डरों का वेल्डर होगा, आग से रिश्ता गहरा है,
दुनिया जोड़ने वाले के हाथों में भी छाला ठहरा है।

शाम ढले जब सूरज बुझता, उसकी आँखें दहकती होंगी,
दिन भर की उस तपती भट्ठी में साँसें उसकी पकती होंगी।
अंगारों-सी लाल पुतलियाँ, माथे पर पसीने की धार,
किसने देखा ईश्वर को भी सहते हुए धूप की मार?

रात उतरती, कमीज़ पर उसकी छेद हज़ार नज़र आते हैं,
दिन भर जिन हाथों से तारे, चाँद और सूरज बन जाते हैं।
जिसने जग की छत बाँधी है, उसका घर बेछत ही होगा,
सबके हिस्से दीप लिखे हैं, उसका हिस्सा तम ही होगा।

वह लोहे से लोहा जोड़कर रिश्तों की बुनियाद रखता है,
टूटी हुई उम्मीदों में भी जीने की फ़रियाद रखता है।
उसकी हर चिंगारी में इक नई सुबह का नूर छिपा,
उसके हर इक घाव के भीतर दुनिया का दस्तूर छिपा।

मंदिर-मस्जिद ढूँढ़ रहे हो, ईश्वर शायद वहाँ न मिले,
जहाँ पसीने की बूँदें गिरतीं, उससे पावन जगह न मिले।
जो अपने श्रम से जग के माथे पर उजियारा धरता है,
ईश्वर कोई आसमान नहीं… वह मेहनत-कश के हाथों में बसता है।
-रतन कुमार कैथवास
2 घंटे पहले
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