विज्ञापन

झूठी कसमें खाते हो

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कितना झूठ बोलने लगे हो,
        
                                                    
                            
पहले तो आप ऐसे न थे,

कितने सच्चे मन से बार बार झूठी कसमें खाते हो,
कैसे कर पाते हो यार…

तुम्हारी हर अदा में अब नई तदबीर आती है,
सच कम ही मिलता है, मगर तासीर आती है।

वो दिन भी थे कि आँखें फ़ैसला कर देती थीं,
अब हर नज़र के साथ कोई तहरीर आती है।

कसमों का क्या है, रोज़ बदल लेती हैं चेहरे,
हर बार लबों पर नई तफ़्सीर आती है।

मैंने तो भरोसे की इमारत खड़ी की थी,
तुम्हारी एक बात से दरार गहरी आती है।

तुम कहते हो, "यक़ीन करो, मैं वही इंसान हूँ",
मगर आवाज़ से पहले ही तेरी तस्वीर आती है।

झूठ भी तुम्हारा क्या हुनर लेकर चला है,
सुनने में दुआ लगता है, बाद में ज़ंजीर आती है।

अब हम भी मुस्कुरा के सिर हिला देते हैं बस,
हर दलील के पीछे कोई तदबीर आती है।

एक बात मगर आज भी समझ नहीं आई…
इतनी सफ़ाई से झूठ बोलने वालों की,

रात को आईने से नज़र कैसे मिलती है,
और इतनी पाक रूह बनकर,
झूठी क़समों पर दुआ कैसे निकलती है।
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all