क्यों इत्र लेकर टहल रहे हो,
क्या खुश होना चाहते हो,
या फिर शादी के निमंत्रण में जाने की तैयारी कर रहे हो।
ज़रा ठहरो, अभी तो ज़िंदगी ने,
इम्तिहानों की स्याही भी पूरी नहीं सुखाई है,
तुमने तो पहले ही,
जश्न की चादर बिछानी शुरू कर दी है।
महक अगर इतनी ही प्यारी लगती है,
तो अपने किरदार को महका कर देखो,
इत्र की खुशबू तो शाम तक ढल जाएगी,
नाम की खुशबू सदियों तक चलती है।
शहनाइयों के पीछे भागने वालों,
कभी मज़दूर के घर भी होकर आना,
वहाँ रोटी की सोंधी महक में,
हर रोज़ एक नई बारात उतरती है।
कपड़ों की सिलवटें सीधी करने से पहले,
इरादों की शिकनें मिटानी पड़ती हैं,
दूल्हे की तरह सजने से पहले,
वक़्त की अदालत में खरा उतरना पड़ता है।
खुशबू उड़ाना आसान है जनाब,
चरित्र की महक पैदा करना मुश्किल है,
फूल तो हर मौसम में खिल जाते हैं,
बाग़बान बनना हर किसी के बस की बात नहीं।
चलो, अगर सचमुच किसी दावत में जाना है,
तो पहले अपने हुनर का न्योता भेजो,
ताली बजाने वाले बहुत मिल जाएँगे,
लेकिन दिल से नमस्कार करने वाले,
मेहनत से पैदा होते हैं।
-रतन कुमार कैथवास