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हो सकता है ईश्वर केवल, मन की एक परछाईं हो

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ईश्वर का रंग क्या होगा, गोरा, साँवला या नूरानी,
        
                                                    
                            
नर की कोई सूरत होगी, या नारी की पेशानी।
किस मिट्टी से गढ़ा गया है, किसने लिखी कहानी,
या सब रंगों में घुल-मिलकर, उसकी है पहचान पुरानी।
हर मज़हब ने रूप दिया है, हर युग ने तस्वीर बनाई,
पर आँखों ने जिसे भी देखा, अपनी ही सूरत नज़र आई।

पेड़ों में भी वही बसे हैं, पशुओं में भी प्राण वही,
पंछी की उड़ती ख़्वाहिश में, नदियों की रवानी वही।
चींटी के संसार में क्या है, हाथी की क्या सोच रही,
किस भाषा में वे कहते हैं, उनकी भी कोई आस कहीं?
हमने अपने शब्दों में उसको, ईश्वर नाम दिया है,
क्या हर जीव ने अपने ढंग से, कोई दूसरा ख़ुदा जिया है?

हो सकता है ईश्वर केवल, मन की एक परछाईं हो,
भूखे मन की तर्क-पिपासा, या आशा की तरुणाई हो।
हो सकता है वह अनंत का, कोई गहरा अर्थ बना,
या फिर हमने शून्य देखकर, एक नाम का दीप चुना।
जो है, वह भी उसी का हिस्सा, जो नहीं है, वह भी वही,
फिर ईश्वर से बाहर क्या है, प्रश्न बचा है आज यहीं।

कहते हैं वह राह दिखाता, फिर राहें इतनी ज्यादा क्यों हैं,
एक सत्य के दावेदारों में, इतनी गहरी खाइयाँ क्यों हैं?
मंदिर-मस्जिद, गिरजे-गुरुद्वारे, सबकी अपनी वाणी,
सबके अपने सच के दावे, सबकी अपनी मनमानी।
यदि तर्क उसी की देन है, तो तर्कों में रण क्यों है,
यदि प्रेम उसी का संदेश है, तो मन में इतना क्षोभ क्यों है?

दोष उसे दें या ख़ुद को, यह प्रश्न बड़ा उलझाता है,
अपनी भूलों का बोझ भी, इंसान उसी पर डालता है।
हमने युद्ध रचे धरती पर, फिर शांति की आस लगाई,
अपने हाथों आग लगाकर, उससे वर्षा करने की दुहाई।
अपनी करनी का उत्तर भी, क्या आकाश से माँगेंगे,
कब तक अपने कर्मों से बचकर, भाग्य-विधाता को टोकेंगे?

कोई उसको मेघ कहेगा, कोई वृक्ष विशाल बताए,
कोई श्वेत दाढ़ी वाला, कोई नारी रूप सजाए।
कोई पत्थर में खोजे उसको, कोई कण-कण में पाए,
कोई ध्यान लगाए बैठा, कोई प्रश्नों से घबराए।
सबकी प्रतिमाएँ जोड़ें तो शायद एक विराट बने,
पर क्या सबके जोड़ने भर से सत्य हमारे साथ चले?

शायद मानव-चेतना ही, ब्रह्मांडों का सार है,
शायद अपनी बुद्धि के आगे, कुछ भी नहीं अपार है।
लेकिन इस निष्कर्ष पर आकर, मन मेरा क्यों ऊब गया,
अपनी ही परिभाषा में जैसे, सत्य कहीं खो गया।
ईश्वर हो तो प्रश्न करूँ मैं, ना हो तो भी सवाल बना रहे,
जब तक साँसें चलती रहेंगी, खोज का यह सिलसिला रहे।
शायद ईश्वर उत्तर कम है, प्रश्नों का विस्तार है ज्यादा,
और मनुष्य की खोज में ही, उसका पहला दीदार है।
-रतन कुमार कैथवास
एक घंटा पहले
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