सफ़र कहाँ तक चलना होगा, सबकी ताक़त बनना होगा,
अवगुण सबके पढ़ना होगा, फिर खुद को भी गढ़ना होगा।
काँटों वाली राह मिले तो, पाँव नहीं रुकने देना,
आँसू पीकर हँसना होगा, हर पत्थर से लड़ना होगा।
जिसको दुनिया हार कहेगी, उसका पाठ समझना होगा,
गिरकर फिर से उठने वाला, पर्वत जैसा बनना होगा।
सबकी बातों में मत बहना, सच का दामन थामे रखना,
झूठ अगर दरबार सजाए, सच बनकर ही अड़ना होगा।
अपनों की ख़ामोशी में भी, कितने अर्थ छिपे रहते हैं,
चेहरों से पहले आँखों का, हर मौसम अब पढ़ना होगा।
रिश्तों की इस भीड़ में अक्सर, मतलब का ही मेला होगा,
फिर भी अपने हिस्से भर का, प्रेम निरंतर करना होगा।
दुनिया केवल फूल नहीं है, काँटे भी स्वीकार करो,
धूप अगर किस्मत में लिखी, छाँव स्वयं ही गढ़ना होगा।
सफ़र कहाँ तक चलना होगा, कोई इसका हिसाब न पूछे,
जब तक साँसें साथ चलेंगी, इंसाँ बनकर रहना होगा।
-रतन कुमार कैथवास