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हार भी मानूँगा

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहुत हुई ये ख़ामोशी, बहुत हुई दूरी,
        
                                                    
                            
कोई तो बात हो अब ज़िंदगी के लिए।

तुम अपनी ज़िद को रख दो ज़रा किनारे पर,
मैं अपनी हार भी मानूँगा दोस्ती के लिए।

न तुम झुको, न मुझे ही झुकाना ज़रूरी है,
बस एक क़दम तो बढ़ाओ कभी ख़ुशी के लिए।

जो टूट सकता है वो रिश्ता नहीं, अहंकार है,
चलो इसे भी मिटा दें नई रोशनी के लिए।

अगर तुम्हें भी कभी मेरी कमी महसूस हो,
तो लौट आना किसी शाम हर खुशी के लिए |
-रतन कुमार कैथवास
एक घंटा पहले
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