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हार भी मानूँगा

                
                                                         
                            बहुत हुई ये ख़ामोशी, बहुत हुई दूरी,
                                                                 
                            
कोई तो बात हो अब ज़िंदगी के लिए।

तुम अपनी ज़िद को रख दो ज़रा किनारे पर,
मैं अपनी हार भी मानूँगा दोस्ती के लिए।

न तुम झुको, न मुझे ही झुकाना ज़रूरी है,
बस एक क़दम तो बढ़ाओ कभी ख़ुशी के लिए।

जो टूट सकता है वो रिश्ता नहीं, अहंकार है,
चलो इसे भी मिटा दें नई रोशनी के लिए।

अगर तुम्हें भी कभी मेरी कमी महसूस हो,
तो लौट आना किसी शाम हर खुशी के लिए |
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
37 मिनट पहले

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