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गुनाहों का मुंसिफ बनना

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहले अपने खुद के गुनाह देखो
        
                                                    
                            
एक फ़कीर ने इतना ही कहा था, फिर आगे बढ़ गया,
शहर मगर उस एक जुमले से देर तक लड़ता रह गया।

हर कोई आईना लिए, दूसरों का चेहरा देख रहा था,
किसी ने अपने दिल की धूल पर नज़र ही न डाली थी।

जो सबसे ज़्यादा इल्ज़ाम बाँटता था महफ़िलों में,
रात को वही अपने ज़मीर से नज़रें चुरा रहा था।

एक बूढ़ी माँ ने बेटे से बस इतना सवाल किया,
बेटा, कभी अपनी गलतियों का हिसाब भी लिखा कर|

वो चुप रहा, मगर उस ख़ामोशी में सदियाँ बोल उठीं,
किताबें नहीं, उसका ज़मीर खुलकर सामने आ गया।

नदी ने समंदर से कहा, "मैं इसलिए साफ़ रहती हूँ,
हर रोज़ अपना ही मैल किनारों पर छोड़ आती हूँ।"

पेड़ ने भी पत्तों से यही राज़ धीरे से कह दिया,
"सूखी शाख़ पहले मैं गिराता हूँ, फिर बहार बुलाता हूँ।"

इंसाफ़ की शुरुआत अदालतों से कम,
इंसान के अंदर बैठी अदालत से ज़्यादा होती है।

जिस दिन हर शख़्स अपने हिस्से का अँधेरा पहचान लेगा,
उस दिन सूरज को किसी शहर में जल्दी नहीं निकलना पड़ेगा।

दूसरों की ख़ताओं का हिसाब रखने वाले बहुत मिलेंगे,
अपने गुनाहों का मुंसिफ़ बनना ही असली इबादत है।

यक़ीन मानो…
जब हर दिल अपने ज़ख़्म और अपनी ख़ताओं का पहरेदार बन जाएगा,
तब कानून कम लिखे जाएँगे,
और इंसानियत ज़्यादा पढ़ी जाएगी।

किसी ने सच ही कहा था…

दूसरों की बजाय अपने गुनाह गिनने शुरू करो,
समाज में गुनाह अपने आप कम हो जाएगा।
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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