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गेट के अंदर स्टूल

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बच्चे जब छोटे थे...
        
                                                    
                            
घर के सामने वाली गली ही,
उनका ईडन गार्डन्स थी,
न कोई अंपायर,
न कोई स्कोरबोर्ड,
बस ईंटों के चार टुकड़े विकेट बन जाते थे,
और हर चौका पूरे मोहल्ले की ख़ुशी बन जाता था।
बड़ा बेटा लकी,
मोहल्ले के अपने दोस्तों के साथ,
शाम ढलने के पहले क्रिकेट खेलने लगता था| ।
छोटा बेटा आयुष...
गेट के अंदर एक छोटे से स्टूल पर खड़ा होकर,
घंटों अपने भैया का क्रिकेट देखता रहता।
उसकी आँखों में भी,
एक बल्लेबाज़ छिपा था,
लेकिन मैदान तक,
उसके कदम नहीं पहुँचते थे।
एक दिन,
बड़े बेटे ने अपने दोस्तों से बड़े गर्व से कहा…
"इस बार मेरे जन्मदिन पर,
मेरे सारे क्रिकेट वाले दोस्त घर आएँगे।"
असल में,
उस साल जन्मदिन मनाने का,
कोई कार्यक्रम नहीं था।
पर बच्चों की खुशी के आगे,
कैलेंडर कब टिक पाया है?
संयोग से उस दिन,
मैं भी दफ़्तर से, समय पर घर आ गया।
घर पहुँचा तो, पूरी कहानी समझ में आई।
मैंने मुस्कुराकर कहा…
"अच्छा... मेहमान बुला लिए हैं,
तो अब मेज़बानी तो करनी ही होगी।"
बस फिर क्या था…
किसी ने केक लाने की जिम्मेदारी ली,
इसकी मम्मी स्नेह रसोई में पूड़ियाँ तलने लगीं,
छोले की खुशबू पूरे घर में फैल गई,
दही-बड़े सजने लगे,
मिठाइयाँ प्लेटों में मुस्कुरा रही थीं।
धीरे-धीरे,
क्रिकेट वाली पूरी टीम,
घर में दाख़िल होने लगी।
लेकिन तभी,
एक अनोखा दृश्य सामने आया।
छोटा बेटा,
अपने छोटे-से प्लास्टिक के बैट से,
हर आने वाले दोस्त को,
दौड़ाकर मारने लगा।
कोई हँस रहा था,
कोई बच रहा था,
पर मुझे उसकी आँखों में,
हँसी नहीं दिखी।
मैंने उसे गोद में बैठाया,
सिर पर हाथ फेरा और पूछा…
"बेटा... ये क्या बात है?"
कुछ देर तक वह चुप रहा।
फिर होंठ फूले हुए थे,
आँखें भीगने लगीं।
धीरे से बोला…
"भैया और उनके दोस्त गुड्डा वगैरह,
मुझे अपने साथ नहीं खिलाते।
बाहर से गेट में कुंडी लगा देते हैं...
मैं अंदर स्टूल पर खड़ा होकर,
बस उन्हें खेलते हुए देखता रहता हूँ।"
उस एक वाक्य ने…
जैसे पूरे घर की आवाज़ रोक दी।
उस दिन पहली बार समझ आया,
कभी-कभी सबसे बड़ा दुख,
हार जाना नहीं होता,
खेल में शामिल न किया जाना होता है।
मैंने बड़े बेटे और उसके दोस्तों को बुलाया।
किसी को डाँटा नहीं,
बस छोटे बेटे की बात,
उन सबके सामने रख दी।
कुछ पल के लिए,
सबकी नज़रें झुक गईं।
फिर एक दोस्त आगे बढ़ा,
उसने छोटे बेटे के कंधे पर हाथ रखा और बोला…
"कल से तू भी खेलेगा...
पहली बैटिंग तेरी होगी।"
बस...
इतनी-सी बात थी,
और छोटे से चेहरे पर,
जैसे खुशी का पूरा आसमान लौट आया।
अगले दिन,
वही गली थी,
वही विकेट थे,
वही गेंद थी।
फ़र्क बस इतना था कि,
इस बार स्टूल खाली रखा था...
क्योंकि उसका असली मालिक,
मैदान में था,
हाथ में बैट लिए,
और हर रन के साथ,
अपने बचपन का हक़ भी बना रहा था।
आज जब दोनों बेटे बड़े हो गए हैं,
तो वह प्लास्टिक का बैट कहीं नहीं मिलता,
वह स्टूल भी शायद टूट चुका है।
लेकिन एक पिता के मन में,
आज भी वह दृश्य जस का तस रखा है…
क्योंकि उस दिन,
जन्मदिन सिर्फ़ बड़े बेटे का नहीं मना था,
उस दिन एक छोटे-से दिल को,
पहली बार पूरा अपनापन उपहार में मिला था।
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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