गंधक वाले पहाड़ी झरने का पानी, न जाने क्या राज़ समाए है,
जिसमें नहाकर इंसान अपने चर्म रोगों से राहत पाए है।
प्रकृति ने खुद ही जैसे कोई औषधालय बनाया है,
न दवा की दुकान, न डॉक्टर… बस झरना बहता आया है।
किस पर्वत की कोख से ये गर्म सल्फर-जल निकला है,
किस भूगर्भीय हलचल ने धरती के भीतर ये रास्ता गढ़ा है।
कहाँ चट्टानें टूटीं, कहाँ धरती की परतें खिसकी होंगी,
किस गहराई में पानी ने खनिजों से अपनी दोस्ती की होगी।
कहीं धरती उठी होगी, कहीं पहाड़ धँस गए होंगे,
कहीं गर्म जल के स्रोत चट्टानों को चीर गए होंगे।
भूगोल की इस उठापटक का हिसाब लगाना आसान नहीं,
प्रकृति के इस प्रयोगशाला में कोई नतीजा आज भी आम नहीं।
हम कहते हैं इसे झरना, मगर ये कहानी बहुत पुरानी है,
हर बूँद में धरती की करोड़ों वर्षों की निशानी है।
विज्ञान आज भी पूछ रहा है… ये चमत्कार आखिर कैसे बना,
प्रकृति मुस्कुराकर कहती है… पहले मेरा पूरा इतिहास और भूगोल पढ़ना।
-रतन कुमार कैथवास