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गलियारों से मौन मिटाये

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गलियारों से मौन मिटाए, आहट उसकी,
        
                                                    
                            
लगता है वो इधर आ रहा, आहट उसकी।

बेचैन वक्त है, कौन हटाए, इस बेचैनी को,
हर धड़कन में उतर रही है चाहत उसकी।

सूनी राहों पर जैसे कोई दीप जला हो,
हवा भी आज बता रही है आहट उसकी।

दरवाज़े तक जाकर फिर लौट आता हूँ मैं,
दिल को मिलती नहीं ज़रा भी राहत उसकी।

खिड़की पर ठहरी शाम भी कुछ कहती है,
रात सुनती है चुपके-चुपके आहट उसकी।

कदमों की आवाज़ नहीं, फिर भी लगता है,
हर मोड़ पे मिल जाएगी चाहत उसकी।

वो आए तो शायद ये बेचैनी थम जाए,
साँसों को फिर मिल जाए थोड़ी राहत उसकी।

गलियारों से मौन मिटाए, आहट उसकी,
लगता है वो इधर आ रहा… आहट उसकी।
-रतन कुमार कैथवास
16 घंटे पहले
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