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एक भ्रम ऐसा भी

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दोपहरी अपने पूरे शबाब पर थी।
        
                                                    
                            
रेगिस्तान की रेत,
सूरज की आग को,
अपने सीने में समेटे तप रही थी।
एक मुसाफ़िर,
कई कोस से चलता आ रहा था।
होंठ सूख चुके थे,
पैरों के निशान,
गर्म रेत पर बनते और मिटते जा रहे थे।
तभी दूर क्षितिज पर,
उसे पानी चमकता हुआ दिखाई दिया।
नीले-से जल का विस्तार...
मानो किनारे पर कुछ पेड़ भी खड़े हों,
जिनकी परछाइयाँ,
पानी में हिलोरें ले रही हों।
उसकी बुझती उम्मीदों को,
जैसे फिर साँस मिल गई।
उसने अपनी चाल तेज़ कर दी।
जितना वह आगे बढ़ता,
वह पानी उतना ही आगे खिसक जाता।
वह दौड़ा...
धड़कनों ने कहा,
"बस थोड़ा और..."
लेकिन जब वहाँ पहुँचा,
तो सामने सिर्फ़ तपती हुई रेत थी।
न पानी था,
न पेड़,
न कोई किनारा।
बस धूप थी...
और धूप से जन्मा
एक भ्रम।
उसने थककर,
रेत पर बैठते हुए,
मुट्ठी भर रेत उठाई।
हवा ने उसे उड़ा दिया।
तभी उसके साथ चल रहे,
एक बूढ़े राहगीर ने मुस्कुराकर कहा…
"बेटा,
इसे मृग-मरीचिका कहते हैं।
प्यासी आँखें,
जहाँ पानी देखती हैं,
वहाँ अक्सर,
सिर्फ़ रेत होती है।
धूप और हवा,
मिलकर ऐसा खेल रचते हैं,
कि दूर से पानी का आभास होता है।
असल में वहाँ कुछ नहीं होता,
सिर्फ़ प्रकाश,
अपनी दिशा बदलकर,
आँखों से एक कहानी कह देता है।"
मुसाफ़िर ध्यान से सुनता रहा।
बूढ़े ने आगे कहा…
"विज्ञान इसे…
प्रकाश का खेल कहता है।
गर्म और ठंडी हवा की परतों से गुज़रती किरणें,
मुड़ जाती हैं,
पूर्ण आंतरिक परावर्तन का भ्रम रचती हैं,
और हमारी आँखें,
रेत पर पानी देख लेती हैं।
लेकिन ज़िंदगी...
ज़िंदगी में भी,
ऐसी मृग-मरीचिकाएँ कम नहीं होतीं।"
मुसाफ़िर ने प्रश्न भरी नज़रों से देखा।
बूढ़ा बोला…
"कभी दौलत,
कभी शोहरत,
कभी अहंकार,
कभी झूठी प्रशंसा...
दूर से सब,
जीवन का मीठा सरोवर लगते हैं।
इंसान पूरी उम्र,
उनके पीछे भागता है।
पास पहुँचता है,
तो हाथ में,
सिर्फ़ मुट्ठी भर रेत बचती है।"
मुसाफ़िर ने पहली बार,
दूर चमकती उस झील को
फिर से देखा।
इस बार,
वह मुस्कुराया।
उसे मालूम था…
वहाँ पानी नहीं है।
वह अपनी मशक उठाकर,
उस दिशा में चल पड़ा,
जहाँ सचमुच एक कुआँ था।
उस दिन उसने सीखा…
रेगिस्तान की मृग-मरीचिका
आँखों को धोखा देती है,
लेकिन मन की मृग-मरीचिका...
वह पूरी ज़िंदगी भटका सकती है।
इसलिए हर चमकती हुई चीज़
समंदर नहीं होती,
हर दिखाई देने वाला किनारा,
मंज़िल नहीं होता।
कभी-कभी,
सच्चाई तक पहुँचने के लिए
आँखों से नहीं,
अनुभव से देखना पड़ता है।
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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